हमारा परम धर्म : दान ---- भाग #१

By @mehta8/1/2018life

हमारा परम धर्म : दान

मानव-जीवन में धर्म का जो स्थान है वह उसके अस्तित्व से जुड़ा हुआ है तथा उसकी आत्मोन्नति का भी आधार है। जीवन में धर्म न हो तो जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए । यदि किसी प्रकार से जीवन कुछ काल के लिए टिका भी रह जाए तो वह जीवन एक मानव का जीवन तो नहीं ही होगा । वह जीवन तो पशु जीवनवत ही हो सकता है । अत: यह तो मानकर ही चलना चाहिए कि मानव-जीवन में धर्म अनिवार्य है ।
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अब प्रश्न यह रहता है कि धर्म क्या है ?

इस विषय पर अनादिकाल से विचार मन्थन होता रहा है तथा होता भी रहेगा । विद्वानों, तत्त्वज्ञों, मुनियों, आचार्यों आदि ने सदैव धर्माचरण की शिक्षा दी है । अपने-अपने चिंतन के अनुसार धर्म का स्वरूप रहा है तथा प्रत्येक ने गुण विशेष पर बल दिया है । किसी ने दया को, किसी ने करुणा को, किसी ने अहिंसा को, किसी ने ब्रह्मचर्य को, किसी ने क्षमा को तथा इसी प्रकार से भिन्न-भिन्न विचारकों अथवा धर्माचार्यों ने भिन्न-भिन्न गुणों अथवा भावनाओं को विशेष महत्त्व दिया है ।

निश्चय ही उपरोक्त सभी भावनाएं धर्म का अंग हैं । किन्तु प्रस्तुत निबन्ध में हम दान धर्म के विषय में चिंतन करना चाहते हैं । किसी महापुरुष ने कहा है – “दान-धर्म सबसे बड़ा धर्म है ।” हमारा भारतवर्ष तो धर्म प्रधान देश है ही । आदिकाल से ही भारतवर्ष में बड़े-बड़े दानी होते चले आए हैं । उनकी दान-भावना दे गुण हम आज भी गाते हैं और आने वाली पीढियां भी उनके इस गुण का स्मरण करती रहेंगी । उदाहरण के लिए ‘महादानी कर्ण’ की कथा हम सभी जानते हैं । प्राण रहे अथवा न रहे किन्तु कोई याचक उनके द्वार से निराश चला जाए, यह सम्भव ही न था । वे दिव्य कवच एवं कुण्डल के साथ उत्पन्न हुए थे । जा तक वे कवच एवं कुण्डल उनके शरीर से जुड़े थे, तब तक उनके शरीर का नाश कोई भी शत्रु नहीं कर सकता था । वे इस बात को जानते थे । एक बार जब इन्द्र ब्राह्मण का वेश बनाकर याचक रूप में उनके द्वार पर आया और उनके वे कवच-कुण्डल मांगे तो महादानी कर्ण ने सब कुछ जानते हुए भी अपने प्राणों का मोह त्यागकर वे कवच एवं कुण्डल याचक को दान में दे दिए । दान के ऐसे उज्ज्वल उदाहरण भारत के अतिरिक्त और किसी देश में नहीं मिल सकते ।

राजा शिवि की परीक्षा भी इसी प्रकार ली गई । इन्द्र ने अपनी माया फैलाई । एक भयभीत कपोत शिवि की गोद में आ गिरा और ‘त्राहि माम्-त्राहि माम्’ पुकारने लगा । उसके पीछे ही एक बाज आ रहा था । बाज का कथन था कि वह भूखा है – उसे अपना आहार चाहिए । राजा शिवि ने अपने शरीर का एक-एक अंग काटकर तराजू में रखना आरम्भ किया कि कबूतर के वजन के बराबर मांस बाज को दे दिया जाए । किन्तु इन्द्र की माया थी । वजन बराबर होता ही न था । राजा शिवि ने जब अपने दोनों हाथ-पैर काटकर तराजू में रख दिए फिर भी वजन पूरा न हुआ तो वे स्वयं ही तराजू में बैठ गए । एक कपोत को प्राण देने के लिए उन्होंने अपने जीवन को ही दान कर दिया ।

हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि धन का दान तो किया जाता है । किन्तु सच्चा दानी तो अपने प्राणों का दान कर देने से भी पीछे नहीं हटता । यह दान की श्रेष्ठतम स्थिति था स्वरुप है ।

आखिर दान का इतना महत्त्व क्यों है ?

अब यह हम इससे आगे की पोस्ट में जानेगें ।

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