जैन दर्शन : परमात्मपद-प्राप्ति की सामग्री - भाग # १

By @mehta7/22/2018life

परमात्मपद-प्राप्ति की सामग्री

**संभवदेव हे धुर सेवो रे ।**
भगवान संभवनाथ की इस स्तुति में महात्मा आनन्दघनजी ने जिज्ञासु और मुमुक्षु पुरुषों को यह हिदायत दी है कि मनुष्य-जीवन का सबसे पहला और सबसे उत्तम कार्य है परमात्मा की उपासना करना, सेवा करना । परन्तु सेवा करने से पहले सेवा का मर्म समझ लो । सेवा किस प्रकार की जाती है और उसके कितने भेद है ? सेवा के वास्तविक मर्म को समझे बिना सेवा करने से पूरी सफलता प्राप्त नहीं होती । aatma.jpg

आगे चलकर इस स्तुति में बतलाया गया है कि कार्य की सिद्धि कारण के बिना नहीं हो सकती । कोई बहिन रसोई बनाना चाहे तो उसे आटे और पानी की आवश्यकता होती है । आटे और पानी के आभाव में शून्य से रसोई नहीं पकाई जा सकती है । दूध नहीं तो खीर कैसे पकेगी (यहाँ मेरे दूध से तात्पर्य पशु दूध से कदापि नहीं है)? कदाचित् दूध भी हो, शक्कर भी हो, चावल भी हो और आग भी विद्यमान हो, किन्तु बहिन जी नींद में निमग्न हों तो भी खीर नहीं पक सकती ।

तात्पर्य यह है कि खीर बनाने के लिए जितने कारणों की आवश्यकता होती है, उन सब की विद्यमानता में ही खीर बन सकती है । एक कार्य की सिद्धि के लिए अनेक कारणों की आवश्कता होती है । वे सब पृथक्-पृथक् ‘कारण’ कहलाते है और उन सब का समूह ‘कारण-सामग्री’ कहलाता है । कारण-सामग्री ही न्यायशास्त्र की परिभाषा में ‘करण’ कहा जाता है । ‘करण’ वह अतिशय साधक कारण है जो कार्य की उत्पत्ति में समर्थ होता है और जिसके होने पर कार्य की उत्पत्ति हुए बिना नहीं रह सकती ।

तो परमात्मपद की प्राप्ति होना कार्य है । इस कार्य की सिद्धि के लिए कारण की अनिवार्य आवश्यकता है । अगर अनुकूल और परिपूर्ण कारण जुटा लिये जाएं तो कार्य की सिद्धि अवश्य होती है ।

अब प्रश्न यह है कि जिसे परमात्मपद प्राप्त करना है, उसे किन-किन कारणों को जुटाना चाहिए ? उसे अभय, अदेव्ष और अखेद बनना चाहिए । अभय का अर्थ यहाँ मन की चंचलता का त्याग करना है । जिस लक्ष्य पर मन लगाया हो, उसे छोड़कर मन का अन्यत्र न जाना, उसी लक्ष्य पर स्थिर रहना अभय है । परमात्मपद की प्राप्ति के लिए यह गुण होना आवश्यक है ।

परमात्मा को वही प्राप्त कर सकता है जिसके हृदय में परमात्मा के प्रति सजीव प्रीति हो और वह हृदय सरोवर में निरंतर हिलोरें मार रही हो । ऐसा नहीं कि जितनी देर व्याख्यान सुनते रहे, उतनी देर तक परमात्मा का नाम प्यारा लगा और ज्यों ही बाहर गए कि दुनिया के चक्कर में पड़ गये, भगवान को भूल गये और पैसा ही परमात्मा से बढ़ कर दिखाई देने लगा । ऐसी चंचल वृत्ति ही भय है । परमात्मा की प्राप्ति के लिये इस भय को – चंचलता को त्यागना अत्यंत आवश्यक है । ‘जमना गये जमनादास, गंगा गये गंगादास’ की कहावत चरितार्थ करने वाले परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त नहीं कर सकते । अतएव अपने लक्ष्य को स्थिर करो और सदैव उसे अपनी दृष्टि के सन्मुख रखो । जो अपने लक्ष्य के प्रति एकनिष्ठ है, पल-भर भी उसे नहीं भूलता, वाही सिद्धिलाभ कर सकता है ।

जिस भाई को व्यापार के लिये कलकत्ता जाना है, वह दिन-रात उसी उधेड़बुन में रहता है । कहाँ ठहरना, कहाँ दुकान करना, किसके साथ सम्बन्ध स्थापित करना आदि बातें उसके दिमाग में चक्कर लगाती रहती है । वह उसी में एक-लक्ष्य हो जाता है । रास्ते में जाते वक्त भी अनेक प्रकार की उसी सम्बन्ध की कल्पनाएँ करता जाता है । चाहे दिन हो या रात हो, सोते, बैठते, खाते, पीते उसका ध्यान व्यापार की ओर ही लगा रहता है । जैसे लोभी मनुष्यों का मन, धन में लीन रहता है, उसी प्रकार सच्चे भक्त का मन परमात्मा में लगा रहता है । इस प्रकार कोई भी सांसारिक या शारीरिक क्रिया करते समय जिसका चित्त परमात्मा के साथ जुड़ा रहता है, वही वास्तव में अभय है । ऐसा अभय भक्त समस्त संसारिक भयों, पीडाओं और क्लेशों से अतीत हो जाता है । वह संसार में रहता हुआ भी संसार से अलिप्त होने के कारण निर्भय है ।

इससे आगे की बात अब अगली पोस्ट में करेंगे ।

परमात्मपद-प्राप्ति की सामग्री की Steeming

Footer mehta.gif

653

comments